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हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकार ने मनमाने तौर पर दुर्भावनापूर्ण ढंग से वैधानिक रूप से चयनित लोगों को बर्खास्त कर दिया।
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सफाई कर्मचारियों की चयन प्रक्रिया इस आधार पर निरस्त नहीं की जा सकती कि इन पदों पर ऊंची जाति के लोगों या एक ही परिवार के कई लोगों का चयन किया गया है। न्यायालय ने कहा है कि आरक्षण कानून के दायरे में रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति को लोक रोजगार का समान अधिकार प्राप्त है। ऐसे में बिना किसी आधार के विहित प्रक्रिया के तहत हुए चयन को रद करना संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन है। इसी के साथ न्यायालय ने गांवों की सफाई के लिए पंचायतराज विभाग फिरोजाबाद में चयनित 828 सफाई कर्मचारियों का चयन निरस्त करने के आदेश को रद कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकार ने मनमाने तौर पर दुर्भावनापूर्ण ढंग से वैधानिक रूप से चयनित लोगों को बर्खास्त कर दिया। न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि चयन सूची के आधार पर सफाई कर्मियों को नियुक्ति पत्र जारी किया जाय और जिन लोगों ने कार्यभार संभाल लिया था उन्हें बकाये वेतन के साथ सेवा में बहाल किया जाय। इससे पहले कोर्ट मिर्जापुर व गोरखपुर के सफाई कर्मियों की याचिकाएं स्वीकार कर चुकी हैं।यह आदेश न्यायमूर्ति राकेश शर्मा ने फिरोजाबाद के मुलायम सिंह की याचिका सहित दर्जनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए दिया है। याचिका के अनुसार एक मार्च 8 को पंचायत राज विभाग ने गांवों की सफाई के लिए एक लाख 8 हजार आठ सौ 48 सफाई कर्मियों की नियुक्ति का आदेश जारी किया। फिरोजाबाद में 828 पद विज्ञापित हुए। चयन बोर्ड के जरिये चयन सूची जारी हुई और नियुक्ति आदेश निर्गत होने लगे। कई ने कार्यभार भी ग्रहण कर लिया। इसी बीच टुण्डला के सत्ता पार्टी के विधायक राकेश बाबू ने चयन में धांधली की शिकायत की। दो सदस्यीय जांच कमेटी ने आरोपों को निराधार पाते हुए चयन को वैध करार दिया। इसके बावजूद सरकार ने आयुक्त को जांचकर चयन निरस्त करने का आदेश दिया। मनमाने तौर पर जांचकर चयन रद कर दिया गया जिसे चुनौती दी गयी थी।
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