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पत्रकारों से बातचीत में सहाय ने कहा कि स्कूलों में बच्चों को फिलहाल परोसे जा रहे ताजा भोजन में स्वास्थ्य व पौष्टिक तत्वों के मानक का ध्यान रखना आसान नहीं है।
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मिड डे मील में खिचड़ी या पैकेट बंद भोजन का झगड़ा ज्यों का त्यों बना हुआ है। खिचड़ी की जगह बिस्कुट परोसने की पैरवी तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने की थी अब खाद्य प्रसंस्करण मंत्री सुबोधकांत सहाय भी इस हक में हैं। दरअसल खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ने नए सिरे से यह मांग उठाई है। उद्योग जगत के साथ बैठक करने के बाद पत्रकारों से बातचीत में सहाय ने कहा कि स्कूलों में बच्चों को फिलहाल परोसे जा रहे ताजा भोजन में स्वास्थ्य व पौष्टिक तत्वों के मानक का ध्यान रखना आसान नहीं है। इसकी जगह पैकेट बंद खाद्य उत्पाद ही उपयोगी व उचित रहेगा। इसमें स्वच्छता,सफाई व पौष्टिक तत्वों का पूरा ध्यान रखा जा सकेगा। जांच के लिए फूड कमीशन एक अधिकृत सरकारी एजेंसी होगी, जिससे पैकेटबंद खाद्य पदार्थो की गुणवत्ता बनी रहेगी। सहाय ने कहा कि इस उद्योग क्षेत्र की बड़ी पूंजी उसकी ईमानदारी व गुणवत्ता है। एकीकृत खाद्य अधिनियम के हाथ से निकल जाने की कसक आज भी सहाय को उस समय साल गई, जब पत्रकारों ने मिलावटी व नकली खाद्य उत्पादों की आई बाढ़ पर उनसे जवाब चाहा। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य यह है कि इसका क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं हो रहा है। दरअसल, इस अधिनियम के बनाने में सहाय ने जी तोड़ मेहनत की थी, लेकिन आखिर में इसके संचालन का अधिकार खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के बजाए स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंप दिया गया। एक अन्य सवाल के जवाब में सहाय ने कहा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग क्षेत्र में कुशल मानव शक्ति, अच्छे शोधकर्ता और प्रबंधकों की कमी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार की प्रतिस्पर्धा में टिक पाने वाले उत्पादों के लिए ढांचागत सुविधाएं भी जरूरी हैं। आगामी आम बजट में उद्योग क्षेत्र की समस्याओं को राहत दिलाने की कोशिश होगी। केंद्रीय उत्पाद और वैट जैसे मुद्दों के अलावा और भी कई सहूलियतों की मांग की गई है। सहाय ने कहा कि जल्दी खराब होने वाले उत्पादों के चलते बैंकों से कर्ज की सुविधा भी नहीं मिल पाती है। इसके लिए बजट में प्रावधान हो सकता है। सहाय ने उद्योग क्षेत्र से भी कहा कि वे अपने खाद्य उत्पादों को भारतीय ब्रांड के नाम से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ले जाएं।
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